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ShAyARi
|| बरसों बाद उठाए पुराने काग़ज़साथ तेरी मेरी तस्वीर निकल आई || || शक उनको था की,बोसा ना ले कोई रात मे गालों मे रख के सोए कलाई रात भर || || बोसा देने मे जो पूछा बिगड़ता क्या है बोला, लेने मे आपको मिलता क्या है || बोसा जो मैने तलब किया तो हस के वो बोले ये हुस्न की दौलत है लुटाई नही जाती || ||लिपटा जो बोसा ले के तो बोले की देखिए ये दूसरी ख़ाता है वो पहला कसूर था || ||अंगड़ाई भी वो ले नेया सके उठा के हाथ देखा जो मुझको तो छोड़ दिया मुस्कुरा के हाथ || कई दिनों बाद फिर शायरी की याद आई...किसी की याद के साथ... "बोसा : किस" विवेक पटनायक
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