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TERE KHAT
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखाजिनको अक उम्र कलेगे से लगाए रक्खा दीन जीको, जिन्हे ईमान बनाए रख्खा... तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे सालहा साल मेरे नाम, बराबर लिखे... कभी दीन मे तो कभी रात मे जागकर लिखहे... तेरे खुसबू मे बसे खत मे जलता कैसे प्यार मे दूबे हुए खत मे जलता कैसे तेरे हाथों से लिखे खत मे लिखे खत मे जलता कैसे... तेरे खत मे आज मे गंगा मे बहा आया हूँ आज बहते हुए पानी मे लगा आया हूँ... लिखने मे जल्दबाज़ी की वज़ह से कुछ शब्द सही नही लिख ...उमीद करता हूँ इस ग़ज़ल की नब्ज़ आप सांझ सकेंगे... विवेक पटनायक ग़ज़ल गायक: जगजीत सिंग
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